जगह कम थी और निर्मला चाची जय से सटके सोई थी।जिस चुचो को जय दूर से देख रहा था ओ अभी उसके एकदम नजर के सामने थे।ओ अपने हाथो को सिर के नीचे रख सोने की कोशिश करने लगा।पर नसीब तो आज निर्मला के साथ था।कम जगह की वजह से मूडी हुई कलाही की कोई निर्मला के चुचो को घिस रही थी।निर्मला सहर गयी।चुचे इतने बड़े और कोमल थे की अपनी कोहनी चुचो को लग रही है इसका जय को ध्यान नही आया।कुछ पल के बाद निर्मला ने खुद ही अपने आप को हिलाते हुए चुचे उसके कलाही की कोहनी पर घिसना चालू किये।इस हरकत के नतीजे जय का लन्ड तन के उछलने लगा।निर्मला तो हवस से भरी थी,बस आनंद ले रही थी।निर्मला जयके से और सटके सो गयी।जय का लन्ड उसके चूतके ऊपरी हिस्से पर घिसने लगा।जय आंख बन्द कर खुद को काबू करने लगा।उसने अपने हाथो को सीधा कर लिया।पर ओ दोनो इतने करीब थे की अभी कोई भी अपने काबू में नही था।निर्मला की गर्म सांसे जय को बेहाल कर रही थी।
जय का चेहरा पूरा लाल हो चुका था।
निर्मला ने इस मौके का फायदा उठाते हुए।उसके शॉर्ट में हाथ डाल लन्ड को पकड़ लिया।अचानक हुई इस हरकत से जय ने फट से आंखे खोल दी
जय:”चाची***”
जय कुछ बोल पाता उससे पहले उसने उसकी मुह पर हाथ दबा कर शांत रहने का इशारा किया।जय भी उस समय बेबस हो गया था।चाची ने उसकी शॉर्ट पैरो से नीचे दबाके उसके लन्ड को पूरा आज़ाद कर दिया।
निर्मला उसके लन्ड को सहलाये जा रही थी।टोपे से नीचे तक उसको हिला रही थी।उसने उसका एक हाथ अपने चुचो पे दबा दिया।निर्मला के लन्ड हिलाने से जय को थोड़ा सुकून मिला।ओ मजे लेने लगा।हवस के चलते और लन्ड के बहोत ज्यादा तन जाने से उसे बीच में दर्द होता था।जब भी निर्मला उसके लन्ड पर जोर देकर हिलाती तब जय मदहोशी में चाची के चुचे दबा देता।पर ये सिलसिला जड़ देर नही टिका।कुछ पल भर में जय ने चाची के नाइटी पर अपना सारा माल झड़ा दिया।चाची ने उसी नाइटी से उसका लन्ड पोंछ कर उसकी शॉर्ट सीधी कर दी।
दोनो भी अभी शांत होकर सो गए।
सुबह के वक्त जय चाचा के बेटी को नर्सरी छोड़ने चला गया।चाची चाचा दोनो काम पे जाएंगे इस की वजह से ओ एक जो एक्स्ट्रा चावी थी वो भी ले गया।नर्सरी से लौटने के बाद उसने देखा की दरवाजा खुला है।उसने चप्पल रखने की जगह चाची का चप्पल देखा।मतलब चाची काम पे नही गयी थी।
जय बाथरूम में हाथ पाव धोके पानी पीने गया तो।किचन से आवाज आई।
“जय नाश्ता लगा दु क्या बेटा??”
जय: हा ठीक है
निर्मला चाय और नास्ता लेके बाहर आई वही अपने सलवार कमीज में।किचन के काम करते वक्त ओ पसीने से भीग चुकी थी।जिसके परिणाम उसके बड़े चुचे जो आधे बाहर थे उन्होंने हवस भरा आकार लेके रखा था।चुचो के ऊपर नोकदार निप्पल का भी दीदार हो रहा था।इस अवस्था में चाची को देख जय को रात के ओ हवस के पल याद आ गए।चाची ने उसके मन में चल रहे विचारो को समझ लिया।
रात में जो हुआ उससे ओ तो बहोत खुश और उत्साहित थी पर जब जय को कल रात के घटना के बाद भी निर्भयता से देखते हुआ पा कर उसका जिगरा ठंडी सांसे लेने लगा।

कल तक जो जय को आकर्षित करने के योजना के विचार से परेशान थी उसको आज पूरा सुकून सा फील हो रहा था
पर यहां पर जय विचलित था,उसे कलरात हुई घटना पर अपराधी सा महसूस हो रहा था।
चाची अपने अंदाज में हसते मुस्कराते हुए,उसके सामने इस तरह बैठी की आधे से ज्यादा चुचे जय को दिख जाए।अइसी नशीली औरत के चुचे देख किसका भी लन्ड फूत्कार मार देगा,वही हाल जय का भी हुआ।उसे इस बात का अहसास होते ही उसने लन्ड को दबाने की कोशिश की।उसकी इस कोशिश को देख निर्मला फुले नही समा रही थी।पर उसे मजे लेने थे,ओ अइसा बर्ताव कर रही थी मानो जैसे उसे कुछ दिख ही नही रहा हो।
जय कामना के आगोश में थर थर कांप रहा था।निर्मला ने उसके सामने चाय करदी।जय ने थरकते कांपते हांथो से चाय का कप उठाया और मुह में लगाने लगा पर उसका ध्यान अभी भी चाची की उस मोटी चूचो पे था।इस का नतीजा ये हुआ की चाय गर्म थी और ओंठो पर लगाते ही उसके ओंठ पर जलन महसूस हुई और उसने कप छोड़ दी।अब हुआ यू की शॉर्ट तो भीगी ही पर उसका लन्ड भी उस गरमाहट का शिकार बना।
ओ एकदम से चिल्लाया “चाची चाची,जल गया आह दर्द हो रहा है”
दोनो जो हवस में डूबेथे थोड़ी ही देर में होश में आ गए।
चाची ने कुछ आव देखा न ताव झटसे अंदर से गिला कपड़ा ले आई और उसके शार्ट के ऊपर से पोंछने लगी।जब उसने पूरे शार्ट पर दबाके कपड़ा फेरा,उस के वजह से शॉर्टऔर गीली हो गयी।पहले ही नशीले बदन की आंखमिचोली से लन्ड गरम होकर तन रहा था,उसी वक्त उस नशीली औरत के कोमल हाथो का स्पर्श होते ही उसका लन्ड लोहे सा तन गया।
दोनो को इसबात का महसूस हुआ तो।दोनो ने एक दूसरे के आंखों में देखा और कुछ पल एके दूसरे को अइसे ही ताकते रहे।दोनो की आंखे एक दूसरे को भीड़ चुकी थी।पंखे की ह ने भी ठंडे हवाओ का रुख उनकी तरफ कर दिया।
जाने या अनजाने में दोनो करीब आने लगे।दोनो की सांसे अभी उस ठंडे हवाओ में गरमाहटपैदा कर रही थी।ओ चुभती गर्म सासे दोनो में और चुदास भे रही थी।
एक ही पल में दोनो के ओंठ एक दूसरे से भीड़ गए।दोनो ने आंखे बन्द कर दी और एकदूसरे के ओंठो का रसपान करने लगे।जय गांव में रहा था पर उसे चुदाई का पूरा ज्ञान था।निर्मला मुम्बई शहर की मचलती रसीली आंटी थी।दोनो का मिलन जैसे आंखों और दिल को लुभाने वाला था।
निर्मला ने जय को अपने बाहो में खींच लिया।खुद पीठ पे सो कर उसे अपने बाहो में कस के दबाये उसके ओंठो को चूसे जा रही थी।
उनकी हवस आगे बढ़े इससे पहले बाहर से किसीने आवाज दी
“पोस्टमैन”
दोनो अलग हुई।चाची ने बेडपे रखी टॉवल को शरीर पे ओढ़ के दरवाजे पर चली गयी,हवस में उनको दरवाजा खुला होने का ध्यान न रहा।
जय उठा जाकर फ्रेश होकर शॉर्ट बदली और बाहर बेड पे आकर बैठ गया।
दोपहर का कहना हुआ।पर तबतक दोनो सिर्फ आँखों से ही बाते कर कहे थे ,दोनो में से एके के भी मुह से शब्द नही निकल रहा था।
आखिर कर इस चुप्पी को तोड़ते हुए जय निर्मला से बोला
“चाची ये सही नही है”
निर्मला:”क्या?”
जय:”चाची ये कल रात से जो हो रहा है ओ।मैं चाचा को धोखा नही दे सकता”
निर्मला:मत दो धोखा,मैंने कब कहा धोखा देने को
जय:पर जो हो रहा है ओ तो*****!!?!
जय के बातो को काट के:उसका कुछ नही होता,वैसे भी तू तो घर का ही लड़का है,और उसमे बुरी बात क्या है,मैं भी खुश तू भी खुश
जय:और चाचा?
निर्मला:तू चाचा की जरूरत से ज्यादा चिंता कर रहा है,अगर दिल से उसे खुश देखने की दिल की तम्मना है तो एक जरिया है।
जय:क्या?
निर्मला:देख तेरे चाचा से अभी चुदाई नही होती(चुदाई शब्द सुनते है जय की आँख कान चौड़े होते है),चौक मत सही कह रही हु,फिर भी ओ एक बेटा चाहते है,मैं अभी मोटी हो गयी हु,अगर तू मेरे साथ सबंन्ध बना लेता है तो होने वाले बच्चे से सारा घर आनंद से भर जायेगा।
निर्मला के आंखों में नमी सी आ गयी।
जय को उस दीं की बाते याद आ गयी।ओ थोड़ा कशमकश में पड़ गया।
जय कुछ न बोले घर से बाहर निकल गया।उसकी जाती परछाही को निर्मला ताकती रह गयी।.
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कहानी जारी रहेगी………..……

सफर चुदाई का struggling वाला पार्ट 1
सफर चुदाई का struggling वाला पार्ट 2
सफर चुदाई का struggling वाला पार्ट 3
सफर चुदाई का struggling वाला पार्ट 5
सफर चुदाई का struggling वाला पार्ट 6
सफर चुदाई का struggling वाला पार्ट 7

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